Friday, September 18, 2015

हंसा तो मोती चुगे: भाषाई राजनीति से उबरना ज़रूरी है

September 18, 2015


महाराष्ट्र सरकार का गैर-मराठी भाषी ऑटो रिक्शा वालों के लिए नया फरमान हास्यास्पद है। सरकार उन्हें मराठी सीखने के लिए बाध्य कर रही है। अरे, सीखना ही है तो वे कुछ और सीखेंगे जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, मराठी ही क्यों? या फिर सरकार ने मराठी भाषा को नरेन्द्र मोदी के कौशल उन्नयन कार्यक्रम मे शामिल कर लिया है?

अजीब मज़ाक चल रहा है। अब सरकारें हर कदम राजनैतिक मकसद के लिए ही लेने लगी हैं। विश्लेषक कहते हैं यह शिवसेना का नया पैंतरा है अपनी जड़ें मजबूत करने का। 21वीं सदी का भारत अब तक क्षेत्रवाद की गंदी राजनीति से उबर नही पाया है। महाराष्ट्र सरकार का यह फरमान आज़ाद भारत की खोखली एकता का नायाब नमूना प्रतीत होता है।

दरअसल यह क्षेत्रवाद ही था जिसने भारतवर्ष को सैकड़ों वर्षों तक खंडित रखा, विभाजित रखा और इसका लाभ मुगल और अँग्रेज़ों ने भरपूर उठाया। दुख की बात है कि अब भी भाषाई दीवारें खड़ी कर क्षेत्रवादी कूपमंडूक राजनैतिक दल अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। यह सिलसिला अब समाप्त होना चाहिए।

हिन्दी भाषा का ज्ञान पर्याप्त है आजीविका चलाने के लिए। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि देश की मातृभाषा होने के बावजूद हिन्दी अनेक प्रांतों मे अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। यह वर्षों से हो रहा है। यह कोई नई बात नही है। और हम सदैव गर्व से कहते रहे हैं - हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा। वाह! और हम मे शामिल कौन-कौन हैं? वे सभी राजनैतिक दल जो साल मे एक दिन हिन्दी दिवस धूमधाम से मनाते हैं परंतु बाकी 364 दिन हिन्दी की व्यापक स्वीकार्यता के लिए कुछ भी नही करते।

भाषा केवल एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझने का माध्यम है। इसे व्यर्थ क्षेत्र, धर्म व वर्ग की अस्मिता से जोड़कर राजनीतिक रंग देना केवल फूहड़ मानसिकता का परिचायक है।

हंसा तो मोती चुगे: बिहार मे विकास से ज़्यादा नीतीश को तरजीह क्यों?

Raipur, July 27, 2015


नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दिल्ली चुनाव मे विकास के बजाए अरविंद केजरीवाल की बातें की और परिणाम भाजपा के विपरीत गया। अब बिहार मे भी मोदी कुछ इसी तरह का सुर अपना रहे हैं। नीतीश कुमार की आलोचना करके बिहार की जनता के हृदय मे स्थान बनाना कठिन कार्य है।

नीतीश कितने भी अवसरवादी राजनेता हों, परंतु उनके द्वारा बिहार मे किए गए कार्यों को अनदेखा नही किया जा सकता। नीतीश कोई सोनिया अथवा राहुल नही हैं जिनके बारे मे जनता मज़ाक बर्दाश्त करेगी। बिहार की जनता को चाहिए विकल्प और वो भी इतना मजबूत जो नीतीश को टक्कर दे सके।

भाजपा मे नेताओं की भरमार है। बिहार से तो एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता हैं। समय चयन का है। मोदी को चेहरा बनाकर विधान सभा चुनाव लड़ना बचकाना है। दिल्ली की तर्ज पर ऐन वक्त मे किरण बेदी जैसे मुख्यमंत्री प्रत्याशी को उतरना भी ठीक नही है। जनता पचा नही पाएगी।

अनंत कुमार को बिहार का चुनावी प्रभार दिया जाना भी समझ से परे है। दिल्ली की हार के बाद अमित शाह के पास अवसर था कि वे बिहार मे अपनी प्रतिभा दिखाते और सिद्ध करते कि उनकी उत्तर प्रदेश की रणनीति कोई हवा-हवाई सोच का परिणाम नही थी वरन एक ठोस व धरातल मे किए गये कार्य का प्रतिफल थी।

एक सोच यह उभरती है कि अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष होकर प्रदेश चुनाव की कमान क्यों संभालेंगे? दूसरी सोच यह है कि जब चुनौती छोटी अथवा बड़ी नही होती तो अमित शाह क्या इस बात से डर रहे हैं क़ि बिहार के परिणाम यदि दिल्ली जैसे आए तो दल मे अन्य नेता उनसे इस्तीफ़ा माँगना प्रारंभ कर देंगे?

कारण जो भी हो, मोदी और शाह की जोड़ी बिहार मे तभी सफलता के परचम लहराएगी जब वे दोनों अपनी-अपनी प्रतिभा का भरपूर दोहन करेंगे और जीत के लिए पूरी ताक़त झोंक देंगे..

Sunday, April 5, 2015

Social equality? My foot!! No girl is safe in the country..


Yogesh Mishra

This is bizarre!! Why on earth defending lawyers of Fabindia are giving pretexts that the camera was installed outside the trial room? What do they mean? Nothing wrong has happened?
Boy!! Nobody knows, for how long the game of recording females changing clothes in Fabindia trial room was going on and here, the culprits are claiming innocence!!!
This is incredible!! How the hell you are innocent, you cowards? As soon as Irani spotted the camera, she called upon local the MLA Michael Lobo who himself saw at least 30 minute-recording before Irani's entry in the store and discovered that all the females who had changed clothes in the trial room during that period were caught in the camera. He confirmed that the camera had captured photographs/video clippings of the females from head to waist.
What is happening in the country? While the people are frequently circulating information pertaining to hidden cameras in the trial rooms of apparel stores, hotels, restaurants, etc, the government, instead of thwarting such clandestine activities by framing stringent law, seems not even aware of it or deliberately ignoring it.
Perhaps, therefore even Irani - the union HRD minister - was about to fall into trap inadvertently as others.
It’s really high time things should change from rules to policies to judicial proceedings. The girl gangraped in Delhi has not yet got justice. Thereafter, N number of rape cases came to fore, but how many rapists are behind the bars? Perhaps none!!
What is the government doing? It has launched several schemes for females. It wants equal participation of females in making India a global leader. Nonetheless, it fails to protect them.
The females are unsafe pan India. They are not even safe in the national capital, forget about small cities. What is the use of running all kind of female-oriented programmes when none offers them secure and dignified life?
And what are we doing as sensible citizens? We take out candle marches after every rape or molestation case. That's all. We talk much about protecting girls. We hold debates on this serious issue and even participate in awareness programmes related to it. The fact is, we simply try to draw public attention on this sensitive matter, but barely act when we are expected to do so.
Girl power!! Oh! Come on. Don't get entangled in these words. There are people who talk about Beti Bachao in the day time and fly to Bangkok to sleep with a girl in the evening. Its time to denude these hypocrites. Its time to object when somebody tease any girl. Its time to ask the apparel store manager to prove that the trial room you are using has no hidden camera. Its time to mount pressure on the government to hang the rapist (be it minor or adult). Raise voice. Merely protecting the females of your home is not enough. Protect every female. Let her breath the air of freedom..

Friday, April 3, 2015

BJP-PDP ties not good for Modi

Why Modi is planning to induct Mehbooba Mufti in his cabinet? You can't believe the Muftis, especially after the bitter abduction episode of Rubaiya Sayeed - the daughter of then union home minister Mufti Mohammad Sayeed in 1989.

The kidnapping drama happened just five days after Mufti Mohammad Sayeed became home minister in VP Singh government. The Centre had to release five JKLF operatives to get back Rubaiya.


After assuming office of the CM in J&K in wake of BJP forging alliance with PDP, Mufti displayed his proclivity towards Pakistan and terrorist outfits by praising them for not causing trouble during assembly elections.

He, once again, hogged the limelight when separatist leader Masarat Alam was released.
His pro-Pak and pro-terrorist statements not only gave opportunity to the opposition parties, but also the BJP allies like Shiv Sena to advise Modi to snap ties with PDP.
Now, if Modi takes risk of including Mehbooba Mufti in his team then you can imagine what strategies would the terror groups formulate to reap benefit from Mufti factor in the Central government.

Monday, April 28, 2014

प्रियंका की कसमसाहट

Yogesh Mishra

April 28, 2014

प्रियंका गाँधी (वाड्रा) की नाराज़गी आजकल चर्चा-ए-आम है। नाराज़गी जायज़ है। आख़िर दाँव पर पति राबर्ट वाड्रा की खोखली प्रतिष्ठा जो है। वाड्रा को देश का सबसे ईमानदार व्यावसायी का प्रमाणपत्र देने के लिए पहले कांग्रेस के तथाकथित बड़े नेता आगे आए, परंतु कुछ ना हुआ। फिर माँ सोनिया गाँधी और भाई राहुल गाँधी ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया, नतीजा सिफ़र रहा। अन्ततः प्रियंका को पति के बचाव के लिए राजनैतिक अखाड़े मे कूदना पड़ा।

प्रियंका कहती हैं कि उनके परिवार ने देश के बहुत कुछ किया, यहाँ तक कि कुर्बानी भी दी। कैसी कुर्बानी? और किसने दी? जहाँ तक इंदिरा और राजीव गाँधी का सवाल है, दोनों ने देश की खातिर जान नही दी बल्कि उनकी हत्या हुई। इंदिरा ने पहले भिंडरावाले जैसे आतंकवादियों को बढ़ावा दिया और फिर उसकी महत्वाकांक्षाओं का शिकार बनीं।

राजीव ने श्रीलंका के आंतरिक मामलों मे पड़ते हुए वहाँ पनपते लिट्टे को समाप्त करने के लिए ज़बरदस्ती शांति सेना भेजी और उनकी कूटनीतिक चूक का ख़ामियाजा ना केवल उन्हें वरन पूरे देश को भुगतना पड़ा। शांति सेना लिट्टे का कुछ भी बिगाड़ नही पाई, हाँ, इस आपरेशन मे सैकड़ों जवानों शहीद ज़रूर हो गए। अन्ततः भारत ने शांति सेना को वापस बुला लिया। पूरी दुनिया मे भारत का मज़ाक बन गया था। एक दिन लिट्टे ने राजीव से अपना हिसाब चुकता कर लिया। आज श्रीलंका भारत की अपेक्षा चीन से अधिक नज़दीक है और और गाहे-बगाहे हमें आँखें तरेरती रहती है। प्रियंका इस सत्य से भली-भाँति वाकिफ़ हैं परंतु इसे स्वीकारने की उनकी हिम्मत नही है।

रही बात देश के लिए कुछ करने की, तो नेहरू-गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल मे देश को क्या मिला? जितने वर्ष उन्होने इस देश मे राज किया उतना वक्त किसी और को मिला होता तो भारतवर्ष का कायाकल्प हो जाता। और यदि नेहरू-गाँधी परिवार ने कुछ अच्छा किया भी तो उसे गिनाने की क्या ज़रूरत है, क्या भारत उसका कर्ज़दार था? अजीब बात है, पहले स्वयं को सेवक निरूपित करते हैं और फिर अहसान गिनाते हैं! अलबत्ता जब तक यह परिवार गद्दी पर रहा, इसने सैकड़ों न्यास (ट्रस्ट) खड़ा कर यह सुनिश्चित कर लिया कि प्रियंका और राहुल की आने वाली कई पुश्तें सात सितारा जिंदगी जी सके।

नेहरू-गाँधी के अलावा देश मे जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उनके परिवार को तो कोई नही जानता। यहाँ तक कि लोग यह भी भूल जाएँगे कि मनमोहन सिंह भी कभी प्रधानमंत्री थे। क्यों? क्योंकि किसी ने अपने परिवार के लिए पैसा कमाने वाले न्यासों (ट्रस्ट) की स्थापना नही की। अगर सभी नेहरू-गाँधी की तरह होते तो भारत मे प्रियंका और राहुल की फौज खड़ी हो जाती और लोगों की जिंदगी बदतर।
प्रियंका को देश सेवा मे इतनी ही रूचि है तो पहले उन्हें त्याग का मर्म समझना पड़ेगा। बिना किसी पद के, ना केवल सोनिया व राहुल, बल्कि प्रियंका, उनके पति और बच्चे वर्षों से सरकारी सुविधाओं का अन्धाधुन्ध इस्तेमाल कर रहे हैं। यह ऐशो-आराम छोड़ना होगा। महज दो-तीन लाख रुपए मे प्रारंभ किए गए कारोबार को पाँच वर्षों मे 325 करोड़ रुपए के साम्राज्य मे तब्दील करने वाले वाड्रा से प्रियंका को ईमानदार के इस शॉर्टकट का राज पूछना होगा ताकि अन्य देशवासियों का भला हो सके। यदि वाड्रा वाकई बेईमान हैं तो प्रियंका को पहल करते हुए अपने पति के खिलाफ पुलिस मे शिकायत कर देना चाहिए।

केवल पाँच साल मे चंद दिन ही साड़ी लपेटकर गिने-चुने लोगों से पड़ोसियों की तरह वार्तालाप करने से कुछ हासिल नही होगा। दम है तो मैदान मे आना चाहिए। प्रियंका यदि इस मुगालते मे हैं लोगों को (या शायद केवल कांग्रेसियों को) उनमे इंदिरा की झलक दिखती है तो उन्हें यह समझना होगा कि वर्तमान मे भारत की जनता तरक्की से कम कुछ नही चाहती - लोक-लुभावन बातों का समय लद गया, जल्द ही राजनीति मे परिवारवाद का भी यही हश्र होगा। बिना प्रतिभा के कोई नही टिकता, बाप-दादा की कमाई कब तक काम आएगी..

Thursday, April 24, 2014

ये मुसलमानों के ख़ैरख़्वाह..

Yogesh Mishra

April 24, 2014


आज़म ख़ान जैसे लोग जब भारतीय सेना को धर्म के नाम पर बाँटने की कोशिश करते हैं तब समझ मे आता हैकि नेता सांप्रदायिकता का जहर किस हद तक फैलाने की काबिलियत रखते हैं। आज़म ख़ान के एक बयान सेसेना को तो कोई फ़र्क नही पड़ा लेकिन आम मुसलमान, जिसकी जिंदगी मदरसों और मस्जिदों के इर्द-गिर्दघूमकर ख़त्म हो जाती है, अवश्य प्रभावित हुआ।

और यह अक्सर होता रहा है। आज़म ख़ान जैसे सत्तालोलुप लोग दशकों से अपने ओहदे, साख और पहुँच केमाध्यम से मुसलमानों को भ्रमित करते आए हैं। आश्चर्य है कि सुधारवादी मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग भी इन कट्टरपंथियों के प्रभाव को कम करने मे असफल रहा है।

दरअसल आज़म ख़ान से सौहार्दपूर्ण बातों की अपेक्षा बेमानी है क्योंकि उनकी ओछी राजनीति को मजबूती प्रदान कर रहे हैं उनके अपने नेता मुलायम सिंह। यही कार्य लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और कांग्रेसी कर रहे हैं। भाजपा अब तब इस खेल से अछूती रही है क्योंकि देश का मुसलमान उसपर भरोसा नही जता पाया है।

भारतवर्ष मे केवल हिंदुओं को बहुसंख्यक माना गया है तथा अन्य धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। अल्पसंख्यकों मे भी मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। शायद हिंदुओं के बाद देश मे सबसे अधिक मुसलमान ही हैं।

परंतु आश्चर्य की बात है कि असुरक्षा की भावना सबसे अधिक मुसलमानों मे ही है जबकि अन्य अल्पसंख्यक धर्म शायद ही असुरक्षा का राग अलापते हैं। कारण साफ है - अलगाववाद व कट्टरवाद की राजनीति करने वाले हमेशा से मुसलमानों को सुरक्षा के नाम पर डराते रहे हैं। ये वही ज़हरीले लोग हैं जिनका स्वयं का धर्म है, ना ईमान। इन्हीं लोगों ने मुसलमानों को धर्म व अज्ञानता के ऐसे दायरे मे बाँध रखा है जिसे लाँघने वाले को काफ़िर का दर्जा दे दिया जाता है।

ऐसे लोग सभी राजनैतिक दलों मे पाए जाते हैं। इनका ध्येय मुसलमानों का विकास नही, शोषण है। वरना क्या कारण है कि मुसलमान, अनुसूचित जाति अथवा जनजाति वर्ग के लोगों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा उन्नत होते हुए भी, या तो विश्वनाथप्रताप सिंह और मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों के लिए आरक्षण का मुद्दा बनकर रह जाता है अथवा कांग्रेस के लिए सुरक्षित वोट-बैंक।


दरअसल ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले देश को तब तक खोखला करते रहेंगे जब तक मुसलमान स्वयं को अल्पसंख्यक मानते रहेंगे। जहाँ तथाकथित अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच की खाई पटी, अनेक राजनैतिक दलों को अपना बोरिया-बिस्तर बांधना पढ़ेगा क्योंकि उनके पास कोई मुद्दा ही नही बचेगा अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए।  

Saturday, February 22, 2014

राजमोहन की इच्छा

February 22, 2014

महात्मा गाँधी के पोते राजमोहन गाँधी ने आम आदमी पार्टी (आप) मे शामिल होते ही कहा कि वे चाहते हैं कि लोग उन्हें राजमोहन के नाम से जानें। कमाल करते हैं राजमोहन जी आप भी! जब इतने बरस गाँधी का लेबल लगाकर घूमने पर भी लोग  आपको जान नही पाए तो केवल राजमोहन के नाम से कैसे जानेंगे?

और आपने अपनी जिंदगी मे ऐसा कौन सा तीर मार लिया कि लोग आपके नाम को इतनी तवज्जो देना शुरू कर दें? आपको यह जानकार बहुत दुख होगा कि यदि आप गाँधी के पोते नही होते तो अरविंद केजरीवाल नही बल्कि आम आदमी पार्टी का कोई कार्यकर्ता आपको सड़क किनारे काउंटर पर सदस्यता फार्म भरवा रहा होता।

आपको तो अपने दादाजी का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि उन्हीं की वजह से राजनीति मे आपका पदार्पण हुआ है।

वाह रे पोते, जिस दादा ने भारत को एक आम आदमी के हैसियत से देखा उसे अब तू आम आदमी पार्टी के चश्मे से देखेगा।

किसने कहा नाम कमाने के लिए राजनीति ज़रूरी है? कुछ और करते। बहुत से लोग कर ही रहे हैं। भई हद है अवसरवादिता की। चलो ठीक है, अब बुढ़ापे मे राजनीति का चस्का लगा है तो उसके साइड अफेक्ट्स झेलने के लिए भी तैयार रहो..


Thursday, November 21, 2013

छेड़खानी के बाद माफी? सवाल ही नही उठता..


Yogesh Mishra 


Raipur November 21, 2013 

अप्रिय तरुण तेजपाल

तुम तहलका के प्रमुख संपादक हो। सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी तुमने पहले अपनी कनिष्ठ महिला पत्रकार का यौन उत्पीड़न किया और अब बिना सज़ा भोगे माफी माँग रहे हो। क्यों? क्या यही हरकत कोई अंजान व्यक्ति तुम्हारी माँ, बहन, बहू अथवा बेटी के साथ करता तो तुम उसे माफ़ कर देते? कभी नही। तुम तो तहलका मचा देते। तुम न्याय की बात करते, क़ानून की बात करते, अदालत की बात करते और समाज के गिरते हुए स्तर की बात करते। लेकिन जब बात तुमपर बन आई है तो किसी तरह से इस मामले को रफ़ा-दफ़ा करना चाहते हो।

यह दोगलापन क्यों? तुम्हें इतना ही प्रायश्चित करने का शौक था तो पुलिस थाने जाते और अपना अपराध स्वीकार करते, न्यायालय मे कड़ी से कड़ी सज़ा माँगते ताकि समाज मे छिपे तुम्हारे जैसे सफ़ेदपोश चरित्रहीन लोग ऐसी हरकत करने की जुर्रत ना करते। परंतु तुमने तो बिल्कुल ही आसान रास्ता अख्तियार कर लिया - यौन शोषण करो, माफी माँगो और फिर यौन शोषण करो, माफी पुनः मिल जाएगी। इस तरह तो तुमने चरित्रहीनों के लिए नया मार्ग खोल दिया, नयी परिपाटी की शुरुआत कर दी।

वाह रे ईमानदार खोजी पत्रकार, तुम्हारी चरित्रहीनता ने फिर यह सिद्ध कर दिया कि बड़ी बड़ी संस्थाओं मे उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति अपनी वासनापूर्ति के लिए कैसे प्रलोभन देकर महिलाकर्मियों का शोषण करते हैं। तुम जैसे वहशी दरिंदों की वजह से ही छोटे शहरों मे रहने वाले लोग अपनी लड़कियों को बड़े शहरों मे नौकरी करने नही देते।


इसलिए तुम्हारी सज़ा तो बनती है। क़ानून की नज़रों मे तुम अपराधी हो और जनता की आँखों मे विश्वासघाती क्योंकि तुमने स्वयं को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का प्रतिनिधि बताकर समाज को दूषित किया है। तुम कठोर से कठोर सज़ा के हकदार हो।

मेरा सुझाव है कि तुम्हे पहले पीड़ित लड़की के परिवार वालों से पिटवाया जाए फिर जनता पिटाई करे और अंत मे पुलिस तुम्हारी मर्दानगी को अंतिम विदाई दे। इसके बाद भी सज़ा की गुंजाइश बचती है क्योंकि तुम एक पढ़े-लिखे ज़िम्मेदार व्यक्ति हो।

Thursday, October 10, 2013

अलविदा सचिन

October 10, 2013


सचिन, 1989 मे जब तुमने पहली बार देश का प्रतिनिधित्व किया तो लगा जैसे कोई अपना बाल सखा खेल रहा है। जब-जब तुम खेले, लगा मैं खेल रहा हूँ। तुम्हारी हर उपलब्धि मुझे अपनी लगती थी। हर चर्चा मे तुम्हारा नाम होता था - "यार सचिन टिका रहा इसलिए जीत पाए।  लड़के मे दम है बॉस। ये साले पाकिस्तानी, सचिन को क्या आउट करेंगे, देखा ना - शोएब अख़्तर को कैसे धोया था पिछली बार। अबे तू ना, फोकट के ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की तारीफ कर रहा है, अपने पास सचिन है बाबा, फिर द्रविड़ और गांगुली उनकी सटका देंगे।भाई जैसा भी पिच कंडीशन हो, छोकरा अगर शुरू के ओवर्स निकाल लेगा ना, तो इंडिया आराम से जीतेगी।"

शायद यही हाल देश के लाखों-करोड़ों लोगों का भी रहा होगा, तभी तो तुमसे उम्मीदें भी ऐसी रखते थे जैसे कोई अपनों से रखता है। जितना तुम खेल के प्रति समर्पित रहे, उतना ही देश तुम्हारे प्रति रहा। दोस्त, एक तुम ही तो हो जिसने क्रिकेट को धर्म मे तब्दील कर दिया।

एक समय यह भी आया जब लोग तुम पर आरोप लगाने लगे कि तुम केवल रिकॉर्ड के लिए खेलते हो। लेकिन मेरे जैसे और कई खेल प्रेमी हैं जिन्होंने तुम्हें लंबी नाकामी के बावजूद खेलने के लिए उतना ही आतुर देखा जैसे कोई नन्हा मासूम खिलौनों को देखकर अधीर हो उठता है।

मित्र - तुम खूब खेले, अब विदाई की बारी है। मैने कल्पना की थी कि खेल के ऐसे पड़ाव मे तुम अपना बल्ला अंतिम बार उठाओगे जब समुचा देश तुम्हे और खेलते हुए देखना चाहेगा परंतु ऐसी स्वर्णिम विदाई सभी के भाग्य मे नही होती, अत्याधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों के भाग्य मे तो शायद नही ही होती।


इन 24 सालों मे हम दोनो ही चालीस के हो गए। चर्चाओं का दौर काफ़ी पीछे छूट चुका है। जब तुम अपनी उपलब्धियाँ बढ़ा रहे थे, मैं स्थायित्व की खोज मे संघर्ष कर रहा था। अब हम खेल के मैदान मे फिर ना मिलेंगे। तुम अपनी सुध लो और मैं अपनी। अलविदा..

Thursday, September 12, 2013

कांग्रेस की राजनीति ग़रीबों के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है?


Raipur, September 12, 2013

राहुल गाँधी कहते हैं कांग्रेस हमेशा से ग़रीबों की लड़ाई लड़ रही है। सही बात है। पिछले साठ वर्षों से कांग्रेस ने ग़रीबों के लिए ऐसी लड़ाई लड़ी कि मध्यम वर्ग के लोग ग़रीब हो गए और ग़रीब बन गए भिखारी। बच गए अमीर - जो कांग्रेसी खाद खाकर और अमीर हो गए। 

परंतु राहुल जी, आपका मंतव्य यह नही है। आप तो दरअसल यह दर्शाना चाहते हैं कि भारतवर्ष मे यदि कोई राजनैतिक दल ग़रीबों का मसीहा है तो वह है कांग्रेस। और यह आप इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आप जानते हैं कि आपके दल ने कभी ग़रीबों को आर्थिक रूप से मजबूत होने नही दिया। तंगहाली और परेशानियों मे जीने वाला ग़रीब आपके दल की झूठी संवेदनाओं मे अपना सुनहरा भविष्य खोजने लगता है और इसी भावावेश मे आपको फिर वोट दे बैठता है। 

राहुल यदि यह कहते हैं कि ग़रीबी एक मानसिकता है तो सत्य कहते हैं। महलों मे रहने वाले लोग ग़रीबी के यथार्थ को कतई स्वीकार नही कर सकते। उनके लिए ग़रीब केवल कहानियों के कमजोर पात्र हैं। इसलिए गंदगी से बजबजाति नालियों के मुहाने जर्जर झोपड़ियों मे रहने वाले चीथड़ों मे लिपटे हुए लोग उनको व्यथित नही करते क्योंकि उनकी सरकार तो इन्हें ग़रीब मानती ही नही। 

राहुल यह भी कहते हैं कि वे आम जनता के सपनो को पूरा करने के लिए अपने सपनों को कुचलने के लिए तैयार हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि कांग्रेस राज मे आम जनता को नींद ही नही आती, वह सपने क्या खाक देखेगी। 

दरअसल कांग्रेस राज मे सपने देखने का हक केवल नेहरू-गाँधी परिवार को होता है। इस बात का इतिहास भी साक्षी है। पूर्व मे नेहरू ने अपने सपनों को साकार करने के लिए जनता के सपनों को दरकिनार कर दिया। वरना सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते और सुभाष चंद्र बोस भारत आ जाते। फिर इंदिरा की महत्वाकांक्षा, संजय के तेवर, राजीव की अधीरता ने कितनों के सपने कुर्बान किए, कौन जानता है। सोनिया प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं, नही बन सकीं। अब हठ तो पूरा करना ही था। इसलिए उन्होने प्रणब जैसे काबिल व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद से वंचित कर मनमोहन को तरजीह दी। कारण साफ था और मंशा एक ही थी - रोबोट को चलाने वाला रिमोट अपने पास रखना। इसलिए आपके मुँह मे ऐसी आदर्शवादी बातें शोभा नही देती। बेहतर है, सत्य बोलिए और कहिए कि आप प्रधानमंत्री बनने का सपने देख रहे हैं और वो भी अपने दल के काबिल दावेदारों के सपनों को कुचलकर।

परंतु राहुल को एक बात ध्यान रखना चाहिए - आम चुनाव मे जनता उनकी तुलना करेगी नरेंद्र मोदी से। यह तुलना होगी अपरिपक्वता व अनुभव की। देश का हाल किसी से छुपा नही है। हमारी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है। केवल ग़रीबी का राग अलापने से कुछ हासिल नही होगा, स्वयं को काबिल साबित करने के लिए सुधारवाद की प्रक्रिया मे अपना योगदान देना होगा। राहुल जी, पहले कुछ उपलब्धि हासिल कर लें फिर उच्च पद की दावेदारी ठोकें, जनता ज़रूर सुनवाई करेगी।

दिग्विजय सिंह जी, बड़बोलापन ठीक नही..

Raipur, July 09, 2013

दिग्विजय सिंह जी, पिछले कुछ वर्षों से आप भाजपा नेताओं पर लगातार हमला बोल रहे हैं। आश्चर्य है, आपके इतना चीखने-चिल्लाने के बावजूद वरिष्ठ भाजपा नेता आपके खिलाफ एक शब्द नही बोलते। इसका अर्थ तो यही है कि भाजपा की नज़रों मे आपका अस्तित्व शून्य है। 

यही हाल आपका अपने दल मे भी है, आप जब-जब भाजपा के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करते हैं, आपका दल आपसे किनारा कर लेता है। 

दिग्विजय सिंह जी, इस तरह की हल्की व फालतू बातें कर अपनी उर्जा का ह्रास ना करें, बल्कि ऐसा सकारात्मक कार्य करें जिससे आपका दल 2019 के आम चुनाव मे अपनी दावेदारी मजबूती के साथ पेश कर सके।

रही बात 2014 के आम चुनाव की - तो उसमे कांग्रेस का क्या हाल होगा आप भी जानते हैं क्योंकि आपके दल की गिरती साख की एक वजह आप और बेनी जैसे व्यक्ति हैं। हाँ, 2014 के चुनाव परिणाम के बाद आपका दल आपकी क्या दुर्दशा करेगा शायद आप नही जानते, लेकिन जनता जानती है, इसलिए बड़बोलापन ठीक नही, यदि जनता ने बोलना आरंभ कर दिया तो आप खामोश हो जाएँगे..

सीडी का डर


Raipur, July 07, 2013


मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री राघव की अश्लील सीडी के खुलासे से छत्तीसगढ़ के एक बदतमीज़ मंत्री के होश फाख्ता हो गए हैं। इस मंत्री को डर है कि कहीं उसके दुर्व्यवहार से पीड़ित उसका कोई नौकर, समर्थक अथवा दल का कार्यकर्ता उसके भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अनाचार की सिलसिलेवार कहानी सीडी मे जारी ना कर दे। 


इस सिरफिरे मंत्री का भय जायज़ है क्योंकि इसने प्रदेश मे ऐसी गंदगी मचा रखी है कि इसके सहयोगी मंत्री एवम् दल के कार्यकर्ता भी तंग आ गए हैं। इस असभ्य भाषी मंत्री के तू-तड़ाक वाले रवैये से अनेक समर्पित कार्यकर्ता आहत हैं। अधिकांश कार्यकर्ता कामना कर रहे हैं कि आने वाले विधान सभा चुनावों मे इसकी जमानत जब्त हो जाए - जो कि संभव है। 



कहते हैं पिछले दस सालों मे इस मंत्री ने जितना कमाया है उतना किसी कांग्रेसी मंत्री ने साठ सालों मे नही कमाया होगा। बहुतों को उसकी हार का इंतज़ार है - वह हारा और वे उसपर टूट पड़ेंगे। बहरहाल इस मंत्री से पीड़ित लोग इसका हश्र राघव की भाँति होता देखना चाहते हैं - केवल इंतज़ार है तो एक गंदगी सॉफ करने वाले पटेरिया का !!!

We don't want politicians in disaster-hit places


Dear politicians,

Kindly stay away from Uttarakhand and never try to visit any of the disaster-hit places in future. The entire humankind is ashamed of your existence on earth. 

The people were dying in Uttarakhand and you were counting them as your vote bank. Shame on you! This is height of impassivity. 

For you people, it is not a disaster in Uttarakhand but a debatable subject to discuss on in print, electronic and social media. You guys are asking each other's party not to politicize the incident but are doing the same on daily basis. 

While you people don't do anything except barking, see how silently and gravely the army jawans are rescuing every victim. At least, try to learn from them and if you can't do anything for the victims, just donate all your money for relief operations. 

I was thinking to write some lines to pay tribute to the people who fell prey to the nature's fury in the Himalayan state but couldn't as I failed to find appropriate words but you politicians are talking in volumes about this incident. I urge you to stop all your nonsense talks and shove off from Uttarakhand right now.

Thursday, May 2, 2013

पाकिस्तान को धोने का समय आ गया है


May 2, 2013

अब समय आ गया है पाकिस्तान पर हमला करने का। सरबजीत सिंह की हत्या का ज़िम्मेदार भारत सरकार भी है जिसने 22 सालों तक पाकिस्तान से कुछ भी नही कहा। अफ़सोस, मनमोहन और सोनिया यह तमाशा चुपचाप देखते रहे। अब जब सरबजीत नही रहा तो भारत सरकार कांव-कांव कर रही है।

अरे पाकिस्तानियों, एक आम भारतीय को मरने से तुम्हें क्या मिला? मारना ही था तो भारत के किसी भ्रष्ट नेता को मार देते। मनमोहन और सोनिया तो इतने देशभक्त हैं कि सरबजीत को रिहा करने के एवज मे तुम्हें अपने परिवार के लोगों को तक सौंप देते। लेकिन नीच देश के नीच सियासतदारों, तुम सब हैवान हो। अब परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।

आज नही तो कल, कोई-ना-कोई मर्द भारत का प्रधानमंत्री बनेगा, तब तुम्हारा क्या होगा? तुम्हारे पाकिस्तान की धज्जियाँ उड़ जाएँगी। लाहौर, कराची, इस्लामाबाद.. सब हमारा होगा। पूरे पाकिस्तान का सूपड़ा साफ हो जाएगा। क्या मुशर्रफ, क्या जरदारी - एक-एक नछुत्तर को चुन-चुन कर मारेंगे।

यार मनमोहन! तुम्हारे पास भी वक्त कम है - उम्र अस्सी की, पद चार दिनों का, पैर कब्र मे, इसलिए उठो और ठोक दो पाकिस्तान को। समतल कर दो वहाँ की नापाक ज़मीन को और बढ़ा दो भारत का नक्शा। फिर तो चेपटे नाक वाले चीनी भी घबराएँगे।

तेवर तीखे रखोगे तो पड़ोसी तमीज़ से पेश आएँगे। चीर दो पाकिस्तान को, पूरा भारत तुम्हारा साथ देगा। ऐसा करने से तुम्हारी कायर पार्टी तिबारा सत्ता मे आ सकती है। जब पाकिस्तानी ज़मीन अपनी होगी, तब वहाँ नए शहर नए लोग बसाने के बहाने फिर करना लूट-खसोट!! कौन रोकेगा तुम्हें??

Tuesday, April 30, 2013

मनमोहन की चिंता


April 28, 2013

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संसद के ना चलने से चिंतित हैं। उनका कहना है दुनिया पूरा तमाशा देख रही है और हंस रही है। भई क्या बात है मनमोहन सिंह जी! आपको बड़ी चिंता है दुनिया की हँसी की? लेकिन यह निहायत ही अफ़सोसनाक बात है कि पूरा देश पिछले नौ सालों से आपकी नाकाबिलियत पर हंस रहा है फिर भी आपको कोई फ़र्क नही पड़ा। घर का जोगी जोगड़ा, बाहर का है संत?

मनमोहन जी! संसार की हँसी का आप कैसा मर्म निकाल रहे हैं, यह तो आप ही जानें परंतु सत्य कुछ और है। संसार आप पर इसलिए हंस रहा है क्योंकि आपके देश का एक निर्दोष नागरिक (सरबजीत सिंह) पिछले 22 सालों से पाकिस्तान की जेल मे सड़ रहा था और हाल ही मे उसपर प्राणघातक हमला हो गया, लेकिन आपको  नेहरू-गाँधी परिवार की तीमारदारी से फ़ुर्सत नही हैं।

विश्व के आठवें सबसे शक्तिशाली देश के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री जी, केवल कागजों मे शेर होने से कुछ नही होता, अपने घर-परिवार की रक्षा करने के लिए कलेजे की ज़रूरत होती है, जो आपके पास नही है। ऐसा दुस्साहस यदि कोई देश अमरीका के साथ करेगा तो अमरीका उसका विश्व-पटल से नक्शा ही समाप्त कर देगा।

संसार आपकी खिल्ली उड़ा रहा है क्योंकि आप देश की सुरक्षा कर पाने मे अक्षम हैं। कश्मीर का आधा से ज़्यादा हिस्सा पाकिस्तान खा गया, बचा हुआ यासीन मलिक और उसके सरीखे गद्दार खा रहे हैं, आप मौनी बाबा बनकर बैठे हैं। बरसों पहले, उत्तर-पूर्व प्रदेशों का हज़ारों किलोमीटर का क्षेत्र चीन खा गया, आपकी तत्कालीन सरकार हिन्दी-चीनी भाई-भाई का राग अलापती रह गई। अब चीन की नज़र लद्दाख पर गड़ गई है, और आप हैं कि पीठ पर छुरी भोंकने वाले चपटी नाकधारी चीनियों को कड़े तेवर दिखाने के बजाए आँख चुरा रहे हैं।

श्रीलंका जैसा लफंटूश राष्ट्र आपके देश पर दबाव बनाने मे इसलिए सफल हो जाता है क्योंकि आपको डर है कि आपकी 'ना' सुनकर वह चीन से हाथ मिला लेगा। नेपाल और बांग्लादेश जैसे अराजक राष्ट्र आपके देश मे हर वर्ष अपने हज़ारों नागरिक धकेल देते हैं और आपको मुँह चिढ़ाते हैं परंतु उनके विरुद्ध जब भी आप आवाज़ निकालते हैं, पता नही क्यों हमें म्याऊँ-म्याऊँ या में-में ही सुनाई देता है।

मनमोहन जी, अन्य राष्ट्र आपकी लाचारी का मज़ा ले रहे हैं क्योंकि जिस आध्यात्मिक भारत ने नारी को देवी का स्थान दिया वहीं आपके राज मे उसकी अस्मिता को चंद विकृत मानसिकता वाले नपुंसक दागदार कर रहे हैं। दुख तो इस बात का है कि देश की राजधानी मे महिलाएँ और बच्चे सुरक्षित नही हैं। आपका क्या है - आप तो ठाठ से चार-पाँच सौ सुरक्षाकर्मियों के बीच घिरे रहते हैं और हमारी मां, बहन, बहू और बेटियाँ पुलिस के साए मे भी स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं। अरे! घर की लाज तो बचा नही सकते, देश की क्या खाक बचाओगे!!

समस्त संसार आपको देखकर इसलिए भी हंस रहा है क्योंकि आप अर्थशास्त्री होते हुए भी देश की अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर रहे हैं। सभी राष्ट्र इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि जिस व्यक्ति के लिए आपको अपनी कुर्सी छोड़ देनी थी उसे आपने राष्ट्रपति बनवा दिया और एक बारहवीं फेल लड़के को प्रधानमंत्री पद देने मे आपको कोई गुरेज़ नही। मनमोहन सिंह जी, ज्ञान और कर्म से धनी व्यक्ति बड़े-से-बड़े पद को भी अपने ठोकरों मे रखता है, पद की लालसा मे किसी की चापलूसी नही करता। 

दरअसल आपकी चिंता इस बात की है कि अगले चुनाव मे यदि आपको आपके दल ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नही बनाया तो दुनिया की यह सोच कि - आप इटली के राशन दुकान वालों के हाथों महज एक कठपुतली हैं - सही साबित हो जाएगी। लेकिन आप ऐसी नौबत क्यों आन देना चाहते हैं? समय रहते चेत जाइए। अपनी बुद्धि का प्रयोग देश के उत्थान के लिए करें, किसी परिवार को खुश करने के लिए नही, अगले कुछ महीनों मे वो करके दिखाएँ जो कांग्रेसियों ने साठ सालों मे नही किया।  शायद देश का इतिहास आपको भी अटल की तरह स्मरण करेगा।

Tuesday, April 23, 2013

बलात्कारी को मौत से पहले यातना दो

April 23, 2013

पूरा देश एक स्वर मे माँग कर रहा है कि मासूम बच्ची का यौन शोषण करने वाले बलात्कारियों को फाँसी दे देना चाहिए। माँग जायज़ है। परंतु बलात्कार जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए फाँसी की सज़ा अपर्याप्त है। पुरुष-प्रधान नपुंसक समाज मे छुपे हवसी दरिंदों के हौसलों को पस्त करने के लिए यातना का प्रावधान आवश्यक है। यातना इतनी भयंकर होनी चाहिए कि कोई पुरुष किसी भी नारी के साथ दुष्कृत्य करने की हिम्मत ना करे।

कैसी यातना? यातना ऐसी जो मैं बता रहा हूँ - भले ही यह अव्यवहारिक लगे। पकड़ मे आते ही बलात्कारी का लिंग काट दिया जाए। फिर एक सप्ताह तक उसे जेल मे पीड़ित के परिवारवालों से पिटवाया जाए। उसके बाद उसके हाथ-पैर काट दिए जाएँ। एक सप्ताह तक दिन भर उससे भीख मँगवाया जाए और रात मे पीड़ित के परिवारवालों से फिर पिटवाया जाए। चूँकि जिस तरह उसने किसी की माँ, बहन, बहू या बेटी के साथ यौन शोषण किया उसके एवज मे यह यातना कुछ भी नही है, इसलिए उस बलात्कारी को अंतत: मगरमच्छों के तालाब मे फेंक देना चाहिए।

मैं मानता हूँ कि लोकतांत्रिक ढाँचे मे इस तरह की यातना संभव नही परंतु सरकार को कोई तो रास्ता निकलना होगा जिससे बलात्कार जैसे घटनाओं मे कमी आए। हाल ही मे सरकार ने नारी उत्पीड़न रोकने के लिए क़ानून बनाया लेकिन बलात्कार जारी है। यदि अपराधी क़ानून से डरते तो अपराध क्यों होता?

फिर भी, सरकार से बहुत ज़्यादा अपेक्षा करना ठीक नही। यदि सरकार कठोर क़ानून बनाएगी तो उन सभी नेता व उनके नाते-रिश्तेदारों का क्या होगा जो यौन शोषण मे लिप्त हैं।

रही पुलिस की बात - तो वह है सरकार की पिट्ठू। वह जनता को भयमुक्त करने के बजाए भयभीत करना पसंद करती है। पुलिस वो बला है जो शिकायतकर्ता को अपराधी साबित कर देती है और अपराधी को निर्दोष। इसलिए पुलिस जैसी चीज़ पर विश्वास करना ख़तरनाक है।

तो जनता करे क्या? केवल आंदोलनों अथवा विरोध से तो बलात्कारियों को सज़ा नही मिलेगी। विरोध भी कोई आख़िर कितने दिन करेगा? इसलिए ज़रूरत है समाज को बदलने की, स्वयं के आदत को बदलने की। नारी का अपमान हर क्षण हो रहा है, उसकी रक्षा का दायित्व हर पुरुष को लेना होगा। चाहे घर हो या बाहर, नारी पर बुरी नज़र रखने वाले को सबक सिखाना ज़रूरी है। नारी को उपभोग की वस्तु समझने वाले पुत्रों को प्रश्रय देने के बजाए परिवारवालों को उसकी ऐसी मरम्मत करनी चाहिए ताकि उसकी नज़रें कभी खराब ना हों।

नारी इस धरा की धरोहर है, मानव-समाज की आन है। उसकी अस्मिता देश की अस्मिता है। अब बलात्कार बंद होना चाहिए। यह समय जागने का है। समाज जागेगा तो यौन शोषण करने वाले स्वत: ही समाप्त हो जाएँगे, नेता कांपेंगे, पुलिस संभल जाएगी।

Laptop politics

April 23, 2013

These days, the state governments have started a new trend of distributing laptops to students. I reckon the students need jobs, not laptops. Isn't it a high time to check braindrain in states?

If you are in power, create jobs - be it in government departments or in private sector. Develop infrastructure. Take effective measures for this.

Once a student gets job, he will buy the laptop of his own choice.

Dear governments, don't play politics with students. If you really want to shape their career, secure their future by creating job opportunities.

Wednesday, October 24, 2012

धन का रोग परमात्मा से बड़ा


(प्रिय मित्रों, मेरा यह लेख आधुनिक युग के बकवाद की श्रेणी का गरिष्ठ प्रस्तुतिकरण है, उम्मीद है आप सब इस वार्तालाप मे उलझ कर रह जाएँगे... ..योगेश मिश्रा)


रमेश जी खानदानी भ्रष्टाचारी हैं। उनकी घ्राण शक्ति श्वानों जैसी है। इस शक्ति का उपयोग वे धन का स्त्रोत ढूँढने मे करते हैं। सरकारी मुलाज़िम हैं व उच्च पद पर आसीन। उनके आसपास केवल भ्रष्टाचारियों का ही जमावड़ा रहता है। ग़रीबों को वे हिकारत भरी नज़रों से देखते हैं। कहते हैं - ये ग़रीब इसलिए हैं क्योंकि ये कुछ करना नही चाहते, वरना हमारे देश मे तो सोना बरस रहा है, जो लूट सकते हैं वो लूट रहे हैं, ये लूट भी नही पा रहे, बड़े अभागे हैं। उनके विचार से लुटना मूर्खता है और लूटना समझदारी।

एक दिन सुबह सुबह मुझसे टकरा गए, बोले - यार, मन खट्टा हो जाता है तुमसे मिलकर। नीरस जिंदगी है तुम्हारी। दो-चार हज़ार रुपयों मे पूरा महीना निकाल लेते हो। फिर भी स्वयं को शान से लेखक, कवि और पत्रकार कहते हो। बातें बड़ी बड़ी, लेकिन जेबें फटी हुईं, बड़े क़लमकार बने फिरते हो। छोड़ो यह सब नौटंकी,  मेरे साथ जुड़ जाओ, मैं तुम्हारी जिंदगी बना दूँगा।

मैने कहा - रमेश जी, मैं ठीक हूँ, मुझे आज भी थाली मे रोटी ही पसंद है, धन चबाना और पचाना मेरे बस का रोग नही। रमेश जी बोले - अरे मूरख, आज धन कमा, कल तेरी आने वाली पीढ़ियाँ खाएँगी। मैने कहा - रमेश जी, आपमे और मुझमे केवल एक फ़र्क है - आप धन खोजते हैं, मैं ज्ञान।

उन्होने पूछा - क्या मतलब?  मैने कहा -  आपके हाथ-पैर कब्र मे लटक रहे हैं, यमराज आपके चक्कर काट रहा है, बीमारियों ने आपके शरीर को खोखला कर दिया है, डाक्टरों ने आपकी जीभ का स्वाद छीन लिया है, रुपये-पैसे हीरे-जवाहरात आपके पास भरे पड़े हैं, लेकिन खाते क्या हैं - खिचड़ी और लोगों से कहते हैं 'सादा जीवन उच्च विचार'। जब कोई आपसे धर्म की बात करता है तो चंदा के पचास रुपए देकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं। आपके अनुसार भगवान बुढ़ापे मे याद की जाने वाली चीज़ है। क्यों? जिसने जीवन दिया, उसे मृत्यु के समय याद करके उसपर उपकार करना चाहते हैं? भई वाह! आप धोखा भी दे रहे हैं तो स्वयं को?

रमेश जी ने कहा - बातों से पेट नही भरता दोस्त, ज़रूरत के समय केवल धन ही काम आता है। नाते-रिश्तेदार तुम्हारे खोखले समाज के पर्याय हैं। मानवता, प्रेम, विश्वास जैसी बातें भावनाओं के गहने बनकर रह गए हैं जो पल भर मे बह जाते हैं।

मैने कहा - रमेश जी, धन की महत्ता को मैं नकार नही सकता। परंतु जब तक इसका सदुपयोग नही होगा, यह केवल सांसारिक वासनाओं की तृप्ति का एक साधन मात्र कहलाएगा । धन आपके कृत्रिम जीवन को भव्य बना सकता है, परंतु आपकी आंतरिक चेतना को जगा नही सकता।

रमेश जी ने कहा - धनी दानी भी होते हैं, धर्मात्मा भी, यदि ऐसा ना होता तो देश के बड़े बड़े धर्मस्थल कभी के नष्ट हो चुके होते।

मैने कहा - वर्तमान काल मे धर्मस्थल व्यापार का केंद्र बनकर रह गए हैं। लोग परमात्मा को पदार्थ का लोभ देते हैं और लाभ-हानि मे अपना साझेदार बनाते हैं। तथाकथित धनी लोग जितना दान करते हैं उससे अधिक दिखावा। धर्म की आड़ मे आडंबर हो रहा है। आजकल के धर्मात्माओं का लक्ष्य परमात्मा को प्रसन्न करना नही अपितु आम जनता को अपने छल से अभिभूत करना है।

रमेश जी बोले - लेकिन धार्मिक व सामाजिक कार्य करने के उद्देश्य से स्थापित ट्रस्ट (न्यास) तो आम आदमी को लाभान्वित कर रहे हैं ना?  मैने कहा - रमेश जी, लोगों का अब ट्रस्ट (न्यास) पर से भी ट्रस्ट (भरोसा) उठ गया है। दरअसल नेताओं व व्यापारियों के लिए ट्रस्ट वॉशिंग मशीन की तरह होता है, उसमे अपने काले धन डालो, थोड़ा धार्मिक-सामाजिक भावनाओं का पावडर छिड़को, धवल-उज्ज्वल धन बाहर आएगा। पहले साधारण पाप गंगा धोती थी, अब पाप हाइ-टेक हो गया, और गंगा की टेक्नालजी पुरानी।

उन्होने कहा - इतने बड़े दार्शनिक हो तो बाबा बन जाओ, कम-से-कम तुम्हारा आगे का जीवन सुखपूर्वक बीतेगा। बाबाओं का जमाना है, अब तो जवान बाबा ही ज़्यादा दिखते हैं, वृद्ध बाबा धूमिल होते जा रहे हैं।  तुम्हारी मूछों की लंबाई  भी पर्याप्त है, बस आवश्यकता है दाढ़ी की। फिर ऐसे ही बकबक करना और तुम्हारी दुकान चल पड़ेगी।

मैने कहा - यही तो मैं कह रहा हूँ, आपकी खोज केवल धन तक ही सीमित है।  मार्ग कोई भी हो - संसारिक या अध्यात्मिक, आप जैसे लोग धन की संभावना तलाश ही लेते हैं। साधु बनना आसान है, साधु का जीवन निर्वाह करना कठिन। भारतवर्ष मे सदियों से लोग अध्यात्मिक मार्ग अपनाने के लिए भौतिक जीवन को त्यागते रहे हैं, परंतु उनमें से अधिकांशतः अपने पीछे छूटे संसार को मुड़-मुड़ कर देखते रहे, पदार्थ का मोह छूट न पाया,  इसलिए वे कभी वैराग्य के परमानंद को अनुभूत नही कर पाए। आप मुझे ऐसे ही साधु बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह संभव नही है। ना तो मैं साधु शब्द का अपमान कर सकता हूँ और ना ही आपकी भाँति भ्रष्टाचार से अर्जित धन का विषपान। रमेश जी, आपको धन का रोग लगा है। आपके लिए जीवन आय्याशी है, मृत्यु भय व परमात्मा गौण। आप वर्तमान के कर्मज्ञ भले  और  मैं कर्महीन।