Wednesday, May 18, 2011

पर राह में तुम मिल गईं, और मैं तुम्हारा हो गया..


मैं चला था चाह में
किसके, न था मुझको पता
पर राह में तुम मिल गईं
और मैं तुम्हारा हो गया

हासिल नहीं मैंने किया था
कुछ, अभी शुरुआत थी
मेरी तरुण वय की, ज़माने से
प्रथम मुलाकात थी

मैं ख्वाब किसके बुन रहा था
सकता नहीं तुमको बता
मैं पाँव किस पथ पर धरा था
भान मुझको कब था भला

कोपलों से फूल, प्रस्फुटित
निहारे, जैसे धरा
ऐसी ही सुरभित हवा में
श्वांस मग्न हो ले रहा था
पर राह में तुम मिल गईं
और मैं तुम्हारा हो गया

उल्लास में मन गा रहा था
प्रकृति भी प्रेम बरसाने लगी
ढूँढने मैं निकल पड़ा 
व्यक्तित्व निज की जानकर
आबोहवा भी पक्षियों के
कलरव से मदमाने लगी

कंटक मेरे पैरों में, बन संघर्ष 
चुभते थे यदा कदा
पर राह में तुम मिल गईं
और मैं तुम्हारा हो गया

छाएंगी अंतस में मेरे 
बाद्लें यूँ प्रीत की
बन फुहारें और मेरे, जीवन
में करेंगी नित झड़ा

सोच की इस मधुर-कल्पना में
फकत दुनिया से मैं
अनभिज्ञ था
पर राह में तुम मिल गईं
और मैं तुम्हारा हो गया





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